11 साल की रेप पीड़िता, गर्भपात की अनुमति नहीं:राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा-शिशु का ब्रेन, फेफड़े बने; अबॉर्शन जानलेवा

आरोप है कि 11 साल की बच्ची के साथ उसके पिता ने ही रेप किया। बच्ची की प्रेग्रेंसी का पता तब चला जब उसे 31 सप्ताह का गर्भ ठहर चुका था।

इस बच्ची के अबॉर्शन के लिए याचिका दिए जाने पर राजस्थान हाई कोर्ट ने प्रेग्नेंसी को एडवांस स्टेज में बताते हुए गर्भपात की अनुमति नहीं दी। कोर्ट ने इससे बच्ची की जान को खतरा बताया।

कोर्ट का यह भी कहना है कि संविधान की धारा 21 के मुताबिक पूरी तरह से विकसित भ्रूण को दुनिया में आने का अधिकार है। हाई कोर्ट ने कहा कि पीड़िता कोर्ट देर से पहुंची।

वहीं बच्ची की प्रेग्रेंसी की जांच करने वाले मेडिकल बोर्ड का कहना था कि लड़की की उम्र कम है और उसका वजन महज 34.2 किलो है। प्रेग्नेंट बच्ची का लिवर फंक्शन टेस्ट (LFT) भी सामान्य नहीं है। ऐसे में गर्भपात करना सुरक्षित नहीं है। इसमें बच्ची की जान जा सकती है।

दूसरी, गर्भस्थ शिशु का ब्रेन और फेफड़ा विकसित हो चुका है यहां तक कि बच्चे की हार्ट बीट भी सही है। मेडिकल बोर्ड का कहना है कि ऐसी स्थिति में अबॉर्शन नहीं किया जा सकता।

हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक केस का भी उदाहरण दिया जिसमें 28 सप्ताह की प्रेग्रेंसी को अबॉर्शन करने की इजाजत नहीं दी गई थी।

पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने भी 11 साल की उम्र की दो रेप पीड़िताओं को अबॉर्शन कराने की इजाजत नहीं दी थी।

सवाल उठता है कि नाबालिग रेप पीड़िता की प्रेग्नेंसी के एडवांस स्टेज में पहुंचने के क्या कारण होते हैं? अहमदाबाद के गाइनेकोलॉजिस्ट और मेडिकल लीगल काउंसलर डॉ. एमसी पटेल इसके 4 कारण बताते हैं-

  • पीड़िता परिवार में किसी को घटना के बारे में बता नहीं पाती।
  • लड़की के शरीर में बदलाव को पेरेंट्स समझ नहीं पाते या देर से समझते हैं।
  • देरी से एफआईआर दर्ज करायी जाती।
  • ऐसे मामलों को लेकर जागरूकता की कमी।

डॉ. पटेल कहते हैं कि रेप पीड़िता माता-पिता को समय पर नहीं बताती। कई बार वह अपनी किसी सहेली के साथ किसी डॉक्टर से राय लेती है।

अगर लड़की के परिवार वालों का इस पर ध्यान चला गया तो भी देरी की वजहें बनती हैं जैसे-अबॉर्शन की दबे छुपे तरीके से कैसे और कहां व्यवस्था करेंगे, खर्च कितना होगा।

इसलिए परिवार बहुत एहतियात बरतता है और यही अबार्शन में देरी की वजह बनती हैं। आर्थिक रूप से कमजोर और कम पढ़े-लिखे परिवार दूरदराज के इलाकों में रहते हैं वे अस्पताल या स्त्री स्वास्थ्य केंद्र तक नहीं पहुंच पाते।

अगर रेप पीड़िता अस्पताल तक पहुंच जाए तो उसे सही सलाह मिल जाएगी कि कहां जाना चाहिए। देरी की वजह से प्रेग्रेंसी का समय बढ़ता जाता है।

रेप पीड़िता को अबॉर्शन की सुविधा मिले-पॉक्सो कानून

पॉक्सो कानून 2012 के अनुसार जिस नाबालिग बालिका के साथ रेप की घटना हुई है उन्हें रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर की ओर से इमरजेंसी मेडिकल केयर देनी होगी। पूरी जांच हो जाने के बाद ही बच्ची को अबॉर्शन की सुविधा मिलनी चाहिए।

सेंटर फॉर इंक्वायरी इनटू हेल्थ एंड एलाएड थीम्स, मुंबई की सीनियर रिसर्चर पद्मा भाटे देवस्थली बताती हैं कि रेप सर्वाइवर को तत्काल कॉन्ट्रासेप्शन देना चाहिए।

परिवार और स्वास्थ्य मंत्रालय की गाइडलाइन में रेप विक्टिम या सेक्शुअल वॉयलेंस की शिकार महिला को अबॉर्शन की सुविधा मुहैया करानी होती है।

लेकिन हकीकत में रेप सर्वाइवर लड़की या महिला के प्रेग्नेंट होने पर उन्हें अबॉर्शन कराने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ता है।

सारी प्रक्रिया इतनी लंबी होती है कि प्रेग्नेंसी के सप्ताह बढ़ते जाते हैं और अबॉर्शन का सेफ पीरियड गुजर जाता है।

‘डेनाएल ऑफ सेफ अबॉर्शन टू सर्वावर्स ऑफ रेप इन इंडिया’ नाम से जारी रिपोर्ट में पद्मा बताती हैं कि दुष्कर्म पीड़िता 72 महिलाओं और 2 लड़कियों पर स्टडी की गई जिन्होंने अबॉर्शन के लिए गुहार लगाई थी।

55 महिलाओं ने 20 सप्ताह की प्रेग्नेंसी के पहले और 19 महिलाओं और दो लड़कियों ने 20 सप्ताह की प्रेग्नेंसी हो जाने के बाद कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

20 सप्ताह बाद की प्रेग्रेंसी में से किसी को भी अबॉर्शन की अनुमति नहीं मिली।

यहां तक की दोनों बच्चियों को भी नहीं, जबकि उन्होंने पूरी तरह से प्रक्रिया का पालन करते हुए हाई कोर्ट से अनुमति मांगी थी।

दुख की बात है कि 20 सप्ताह की प्रेग्नेंसी वाली 55 में से 36 महिलाओं को ही अबॉर्शन की अनुमति मिली जबकि उन्हें बिना किसी विलंब के ही अनुमति मिल जानी चाहिए थी।

किस तरह नियम-कानूनों का हवाला देकर देरी की जाती है इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है-

10 साल की लड़की से उसके चाचा ने ही बलात्कार किया। जैसे ही बच्ची की फैमिली को इसकी जानकारी मिली उन्होंने बच्ची के लिए तत्काल मेडिकल मदद पाने के लिए संपर्क किया ताकि जल्दी से अबॉर्शन हो सके।

हॉस्पिटल ने 26 सप्ताह की प्रेग्नेंसी बताई। गर्भपात की अनुमति लेने के लिए बच्ची और उसके परिवार को डिस्ट्रिक्ट कोर्ट भेजा गया।

कोर्ट ने मेडिकल बोर्ड बनाया। बोर्ड ने अबॉर्शन को लेकर क्या राय दी, इसका बिना खुलासा किए बिना डिस्ट्रिक्ट कोर्ट ने अबॉर्शन की अनुमति देने से इंकार कर दिया।

मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा जहां फिर से मेडिकल बोर्ड बिठाकर राय मांगी गई। इस समय तक बच्ची की प्रेग्नेंसी 32 सप्ताह की हो चुकी थी।

डिस्ट्रिक्ट कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक मामला जाने में ही 6 सप्ताह निकल गए। सुप्रीम कोर्ट को भी बोर्ड ने यही कहा कि इस स्टेज में गर्भपात कराना मां के जीवन को खतरे में डाल सकता है। बच्ची को गर्भपात कराने की अनुमति नहीं मिली।

जैसे ही किसी पुलिस ऑफिसर को किसी नाबालिग के साथ रेप की घटना के बारे में पता चलता है उसे सबसे पहले पीड़िता को नजदीकी अस्पताल ले जाना चाहिए ताकि तत्काल मेडिकल सुविधा मिल सके।

डॉक्टर को बच्ची के माता-पिता या उसके किसी संबंधी जिस पर बच्ची भरोसा करे, उसके साथ इमर्जेंसी कंट्रासेप्टिव्स को लेकर बात करनी चाहिए ताकि प्रेग्नेंसी को रोका जा सके।’

महाराजा सयाजी राव यूनिवर्सिटी, बड़ौदा की असिस्टेंट प्रोफेसर नम्रता लुहार बताती हैं कि रेप एक मामूली जुर्म नहीं बल्कि सामाजिक बुराई है।

कई बार ऐसे अपराध की रिपोर्ट तक दर्ज नहीं की जाती। जो मामले रिपोर्ट होते हैं उन्हें भी दबा दिया जाता है। नाबालिग रेप पीड़िता की भी समझ से बाहर होता है कि उसके साथ किस तरह का अपराध हुआ है।

बच्चों और यहां तक कि टीनएज उम्र में भी लड़कियों को अपनी रिप्रोडक्टिव हेल्थ के बारे में सही जानकारी नहीं होती।

मां-बाप बच्चियों से इस बारे में कभी बात नहीं करते और बात न करना उनकी अपनी बेटी के लिए जिंदगी भर का जंजाल बन जाता है।

कुछ टीनएज लड़कियां अपनी प्रेग्नेंसी के बारे में जान जाती हैं लेकिन वो परिवार से छुप कर जैसे-तैसे असुरक्षित तरीके से अबॉर्शन कराना चाहती हैं। कई बार परिवार डॉक्टर पुलिस-कोर्ट के चक्कर में नहीं पड़ना चाहता। भुगतना लड़की को पड़ता है।

जब 20 सप्ताह का समय बीत जाता है तो लड़की को प्रेग्रेंसी से जुड़े लक्षण साफ दिखने लगते हैं।

महाराष्ट्र के वर्धा जिले के सेवाग्राम में महात्मा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (MGIMS)में फॉरेंसिक मेडिसिन के प्रोफेसर डॉ. इंद्रजीत खांडेकर कहते हैं कि बच्चियों और पेरेंट्स के बीच कम्यूनिकेशन नहीं होता।

पीरियड्स रुक गए हैं, पेट में बदलाव आया है तो बच्चियां पेरेंट्स को नहीं बताती। उन्हें लगता है कि बताने पर मां-बाप मारेंगे, पीटेंगे।

स्कूल में भी बच्चों को रिप्रोडक्टिव हेल्थ के बारे में जानकारी नहीं दी जाती। इसलिए लड़कियां संकोच करती हैं और प्रेग्रेंसी का समय बढ़ता जाता है।

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