मेजर ध्यानचंद: जिनके नाम पर खेल दिवस, उस खिलाड़ी को आज तक नहीं मिला देश का सर्वोच्च सम्मान

देश के भीतर फिलहाल जिस खिलाड़ी की सबसे ज्यादा चर्चा है उनका नाम नीरज चोपड़ा है जो वर्ल्ड एथलेटिक्स चैंपियनशिप में भारत के लिए पहला गोल्ड मेडल हासिल कर तिरंगे का मान बढ़ा चुके हैं. नीरज इससे पहले टोक्यो ओलपिंक में जेवलिन थ्रो में देश को पहला स्वर्ण पदक भी दिला चुके हैं. नीरज चोपड़ा भी उसी मेजर ध्यानचंद अवॉर्ड से सम्मानित हैं जिसे भारत में खेलों का सबसे बड़ा पुरस्कार कहा जाता है. यह सम्मान हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद के नाम पर दिया जाता है, जिन्होंने तीन-तीन ओलंपिक खेलों में भारत का परचम बुलंद किया. शायद यही वजह रही कि देश को आजादी मिलने के बाद हॉकी को हमारा राष्ट्रीय खेल बनने का गौरव मिला था.

राष्ट्रीय खेल में भारत का मान बढ़ाने वाले ध्यानचंद ‘दद्दा’ के लिए पिछले कई वर्षों से भारत रत्न की मांग की जा रही है, लेकिन पिछली यानी कांग्रेस की सरकार से लेकर मौजूदा भाजपा सरकार ने एक तरह से अब तक इस मांग को अनसुना किया हुआ है. हालांकि मोदी सरकार ने साल 2021 में खेलों के सर्वोच्च पुरस्कार का नाम बदलकर ध्यानचंद के नाम पर किया था जो पहले पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के नाम पर था. फिर भी हर साल की तरह आज ध्यानचंद के जन्मदिन यानी राष्ट्रीय खेल दिवस के मौके पर फिर से दद्दा को भारत रत्न देने की मांग उठी रही है.

‘ध्यानचंद, भारत रत्न के लिए सबसे बड़े हकदार’

खेलों में अब तक सिर्फ क्रिकेटर सचिन तेंदुल्कर को भारत रत्न दिया गया है. इस मांग को लेकर ध्यानंद के बेटे और पूर्व ओलंपियन अशोक ध्यानचंद ने कहा कि इस बारे में मेरा बोलना बार-बार अच्छा नहीं लगता क्योंकि ये मांग काफी पहले से उठाई जा रही और मैं तो उनके परिवार का सदस्य हूं. साथ ही कब से पूर्व ओलंपियन से लेकर कई खेलप्रेमी इस मांग को दोहरा रहे हैं. फिर हमने इस मुद्दे पर पूर्व हॉकी कप्तान जफल इकबाल की राय जाननी चाही तो उनका साफ कहना था कि खेलों में योगदान के लिए ध्यानचंद भारत रत्न पाने के सबसे बड़े हकदार हैं.

मेजर ध्यानचंद

दद्दा को भारत रत्न की मांग

जफर इकबाल ने आगे कहा कि जिस समय में ध्यानचंद हॉकी खेले हैं, उस वक्त हिन्दु्स्तान को नाम भी चाहिए था और पहचान भी. ऐसे वक्त में उन्होंने देश का मान बढ़ाया था और वह आज की हॉकी की नींव हैं. उन्होंने कहा कि हमने उन्हें भारत रत्न दिलाने को लेकर काफी लड़ाई लड़ी है और आज भी भरोसा नहीं होता कि ध्यानचंद को अब तक भारत रत्न क्यों नहीं दिया गया. जफर इकबाल आगे कहते हैं कि हमारे दिलों में हमेशा ये बात बनी रहेगी और इस संघर्ष में हम पीछे हटने वाले नहीं हैं.

भारतीय हॉकी टीम के पूर्व सेलेक्टर इकबाल ने कहा कि अगर फिर भी दद्दा को भारत रत्न नहीं मिलता तो वह किसी भी रत्न से कम नहीं हैं. उन्होंने सीएम योगी से गुहार लगाते हुए कहा कि वह सबसे बड़े सूबे के मुख्यमंत्री हैं और उनके प्रदेश के ही एक खिलाड़ी को यह सर्वोच्च सम्मान मिले इसकी सिफारिश उन्हें भी केंद्र सरकार से करनी चाहिए. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद खिलाड़ियों को काफी प्रमोट करते हैं और ऐसे में सीएम योगी की तरफ से भी यह मांग उन तक पहुंचाई जानी चाहिए.

झांसी में बना म्यूजियम

झांसी में मेजर ध्यानचंद के नाम पर एक म्यूजियम तैयार किया गया है, जिसका उद्घाटन सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मंगलवार को किया. इसी कार्यक्रम में शामिल होने पहुंचे अशोक ध्यानचंद और जफर इकबाल की ओर से साफ कहा गया कि हम दद्दा को भारत रत्न देने की मांग को सीएम योगी तक लेकर जाएंगे और भरोसा है कि सरकार हमारी मांग पर कदम उठाएगी.

ध्यानचंद ने ओलंपिक में जिताए तीन गोल्ड

आपको बताते चलें कि मेजर ध्यानचंद ने तीन ओलंपिक 1928 एम्सटर्डम, 1932 लॉस एंजेलिस और 1936 बर्लिन में भारतीय टीम को गोल्ड मेडल दिलाया था. हर साल उनके जन्मदिन पर खेल दिवस मनाया जाता है. साथ ही ध्यानचंद को 1956 में पद्मभूषण से भी नवाजा गया फिर भी सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न देने की मांग लगातार उठाई जाती रही है.

हॉकी के जादूगर को कब मिलेगा भारत रत्न?

गौरतलब है कि साल 2014 में भारत रत्न देने की कैटेगरी में स्पोर्ट्स को भी शामिल किया गया था. इससे पहले तक किसी भी खिलाड़ी को यह पुरस्कार नहीं मिला है. सचिन तेंदुलकर यह सम्मान पाने वाले पहले खिलाड़ी बने. लेकिन ध्यानचंद के परिवार और हॉकी प्रेमियों को अब भी इंतजार है कि आखिर कब हॉकी के जादूगर को इस सम्मान से नवाजा जाएगा.

ध्यानचंद के करियर के फैक्ट 

– आपको यह जानकर हैरानी होगी कि मेजर ध्यानचंद को बचपन में हॉकी नहीं, कुश्ती से ज्यादा लगाव था.

– चूंकि ध्यान सिंह रात में बहुत अभ्यास करते थे, इसलिए उन्हें अपने साथी खिलाड़ियों द्वारा उपनाम ‘चांद’ दिया गया. दरअसल, उनका यह अभ्यास चांद के निकल आने पर शुरू होता था.

– एक बार उन्होंने कहा था- अगर किसी ने मुझसे पूछा कि वह सबसे अच्छा मैच कौन-सा था, जो मैंने खेला, तो मैं कहूंगा कलकत्ता कस्टम्स और झांसी हीरोज के बीच 1933 का बेटन कप फाइनल.

– भारत ने 1932 के ओलंपिक के दौरान अमेरिका को 24-1 और जापान को 11-1 से हराया. ध्यानचंद ने उन 35 गोलों में से 12, जबकि उनके भाई रूप सिंह ने 13 गोल दागे. इससे उन्हें ‘हॉकी का जुड़वां’ कहा गया.

– एक बार जब ध्यानचंद एक मैच के दौरान गोल नहीं कर पा रहे थे, तो उन्होंने गोल पोस्ट की माप पर आपत्ति जताई. आखिरकार वे सही पाए गए. गोल पोस्ट अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत निर्धारित अधिकारिक न्यूनतम चौड़ाई का नहीं था.

– 22 साल तक भारत के लिए खेले और 400 इंटरनेशनल गोल किए. कहा जाता है- जब वो खेलते थे, तो मानो गेंद स्टिक पर चिपक जाती थी. हॉलैंड में एक मैच के दौरान चुंबक होने की आशंका में उनकी स्टिक तोड़कर देखी गई. जापान में एक मैच के दौरान उनकी स्टिक में गोंद लगे होने की बात भी कही गई.

– ध्यानचंद का 3 दिसंबर, 1979 को दिल्ली में निधन हो गया. झांसी में उनका अंतिम संस्कार उसी मैदान पर किया गया, जहां वे हॉकी खेला करते थे.

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