523 साल पुराने शक्तिपीठ त्रिपुर सुंदरी में नवरात्रि:अष्टमी पर 15 किलो सोने और 180 किलो चांदी से होगा देवी का श्रृंगार

आज नवरात्रि का पहला दिन है और मैं त्रिपुरा की राजधानी अगरतला से रविवार अलसुबह उदयपुर की पहाड़ियों पर मौजूद त्रिपुर सुंदरी मंदिर पहुंच गया हूं।

त्रिपुर सुंदरी…। त्रिपुर यानी तीनों लोकों (आकाश, धरती और पाताल) की श्रेष्ठ सुंदरी।

ये 51 शक्तिपीठों में से एक है। मान्यता है कि यहां देवी सती का सीधा पैर गिरा था। इन्हीं के नाम पर त्रिपुरा स्टेट का नाम भी है। त्रिपुर सुंदरी दुर्गा का काली अवतार है। सुबह 4 बजे मंदिर के पट खुले। इसके बाद पंचदेवों के साथ त्रिपुर सुंदरी का विशेष पूजन हुआ। ये सिलसिला पूरी नवरात्रि चलेगा।

त्रिपुरा के गोमती जिले के इस मंदिर में भक्तों के आने का सिलसिला सुबह 4 बजे से शुरू हो जाता है। नवरात्रि से एक दिन पहले शनिवार को माता के मंदिर को पीले और नारंगी रंग के गेंदा फूलों की माला से सजाया गया। त्रिपुरेश्वरी और त्रिपुर सुंदरी के नाम से प्रसिद्ध माता त्रिपुरा सुंदरी के प्रातःकाल के दर्शन के साथ सैकड़ों साल पुरानी मान्यता जुड़ी हुई है। यहां सुबह के दर्शन को सबसे अहम माना जाता है।

अष्टमी पर 15 किलो सोना और 180 किलो चांदी से होगा देवी का श्रृंगार
पिछले 40 साल से नवरात्रि में चंडी पूजा करते आ रहे 63 साल के पुरोहित आशीष चक्रवर्ती कहते हैं, “523 साल पहले नवरात्रि के समय जिस विधि से इस मंदिर में चंडी पूजा और पाठ होते थे, आज भी सब कुछ वैसा ही चल रहा है।”

त्रिपुरा सुंदरी मंदिर के प्रबंधक मानिक दत्ता कहते हैं, ”महाराजा के समय से लेकर अब तक सरकारी खजाने में मंदिर का करीब 15 किलो सोने और 180 किलो चांदी के गहने जमा हैं। साल में केवल दो बार इन आभूषणों को कड़ी सुरक्षा के बीच मंदिर में लाया जाता है। केवल अष्टमी और दीपावली पर देवी को पहनाने के लिए जिन आभूषणों की जरूरत होती है वही लाए जाते हैं।”

हर दिन एक बकरे की बलि चढ़ती है देवी को
ये तंत्र की सिद्ध पीठ मानी गई है, मंदिर में देवी को रोज एक बकरे की बलि चढ़ाई जाती है, माना तो ये भी जाता है कि प्राचीन काल में रोज देवी को एक नरबलि दी जाती थी। बकरे की बलि मंदिर ट्रस्ट की ओर से होती है। सरकार की ओर से ट्रस्ट इसका खर्च उठाता है। बलि के लिए कसाई तय होते हैं जो बलि की परंपरा को निभाते हैं। आम लोग भी अपनी मनोकामना पूरी होने पर मंदिर में बलि चढ़ाते हैं। इसके लिए ट्रस्ट ने फीस तय की हुई है।

त्रिपुर सुंदरी मंदिर में दीपावली पर भी होता है बड़ा उत्सव
त्रिपुर सुंदरी शक्तिपीठ में तंत्र साधक साधनाएं करते हैं। त्रिपुर सुंदरी मंदिर में सबसे बड़ा उत्सव दीपावली पर होता है। इसे यहां दीपावली काली पूजा के रूप में मनाया जाता है। इस अवसर पर बड़ा मेला लगता है।

कूर्म पीठ भी कहा जाता है त्रिपुर सुंदरी शक्तिपीठ को
मंदिर की बनावट और वास्तु कुछ इस तरह से तैयार किया गया है कि ये भक्तों और पर्यटकों दोनों को आकर्षित करता है। मंदिर का निर्माण बंगाली वास्तुशैली एकरत्न में कराया गया था। जिस पहाड़ी पर यह मंदिर स्थित है, उसका आकार कछुए की पीठ के जैसा है। इसी कारण इसे कूर्म पीठ भी कहते हैं।

माना जाता है कि इस जगह भगवान विष्णु का मंदिर बनना था। निर्माण शुरू भी हो चुका था, लेकिन त्रिपुरा के तत्कालीन राजा धन्यमाणिक्य को सपने में देवी ने दर्शन दिए। सपने में राजा को ये पता चला कि जहां विष्णु मंदिर बन रहा है, वहां पहले शक्तिपीठ था। इस सपने के बाद राजा ने बांग्लादेश के चिटगांव में काले पत्थर की बनी त्रिपुर सुंदरी की प्रतिमा को लाकर मंदिर के गर्भगृह में स्थापित कर दिया। ये घटना सन् 1501 की है।

मंदिर के गर्भगृह में काले ग्रेनाइट पत्थर से निर्मित दो प्रतिमाएं स्थापित हैं। पांच फीट ऊंचाई की मुख्य प्रतिमा माता त्रिपुर सुंदरी की है, जबकि दो फीट की दूसरी मूर्ति है, जिसे छोटी माता कहा जाता है, यह मूर्ति भुवनेश्वरी देवी की है।

त्रिपुर सुंदरी के पुरोहितों को कन्नौज से लाकर बसाया गया

इस मंदिर में पूजा करने वाले पुरोहितों का इतिहास भी सैकड़ों साल पुराना है। त्रिपुर सुंदरी मंदिर बनने के बाद महाराजा ने माता की पूजा के लिए उत्तर प्रदेश के कन्नौज से पुरोहितों के दो अलग-अलग वंश के लोगों को यहां बुलाया।

इस मंदिर में पूजा कर रहे चंदन चक्रवर्ती कहते हैं, “मुझे अपनी तीन पीढ़ी तक के नाम ही याद हैं। महाराजा कन्नौज से दामोदर पांडे और गदाधर पांडे को यहां लेकर आए थे। हम उनके ही वंशज है। बाद में राजा ने हम पुरोहितों को चक्रवर्ती की उपाधि दी थी। इस समय मंदिर में 76 पुरोहित हैं, जो अपनी बारी के अनुसार पूजा करते हैं।”

देवी मां को कौन-कौन सी चीजें खासतौर पर चढ़ाते हैं?

मंदिर में देवी को साड़ी, सोने के गहने, मिठाइयां, भोग के लिए चावल-दाल और बलि के लिए बकरे देने का रिवाज है। यह सारा प्रसाद मंदिर प्रबंधन कार्यालय में पहले जमा करना होता है। इनमें ज्यादातर लोग देवी को रंगीन सीढ़ियां चढ़ाते हैं। इन प्रसाद के साथ 20 रुपए से लेकर 50 रुपए तक की पर्ची काटी जाती है। भक्तों को मंदिर में बनने वाले अन्न भोग खाने के लिए 70 रुपए की अलग से एक पर्ची लेनी होती है।

पुरोहित आशीष चक्रवर्ती कहते हैं, ”यहां देवी काली का रूप है, लेकिन उनकी चीभ अंदर है। इसलिए देवी मां बहुत कृपालु हैं वो अपने भक्तों को कभी निराश नहीं करतीं। यहां जो भी मन्नत मांगी जाती है वो हमेशा पूरी होती है।”

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