अनोखा शिवलिंग जो चिता की राख पर विराजे हैं, पारा से बने हैं 1111 किलो के महादेव

जबलपुर. संस्कारधानी को शिवभक्ति व यहां के ऐतिहासिक व प्राचीन शिवालयों के लिए जाना जाता है। जिले में महज सात वर्ष पूर्व निर्मित एक ऐसा शिवालय है जो भक्तों की आस्था का बड़ा केंद्र है। शहर से 35 किमी दूर कटंगी के प्रज्ञाधाम आश्रम में यह शिवालय है। यहां 1111 किलो के पारदेश्वर महादेव विराजमान हैं। विश्व का सबसे बड़ा पारे से निर्मित शिवलिंग होने की वजह से इसका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज है। सावन में यहां शिवभक्तों की कतार लगती है।

एक करोड़ नर्मदेश्वर के पूजन का पुण्य

साध्वी विभानन्द ने बताया कि एक करोड़ बार नर्मदेश्वर शिवलिंग की पूजा का फल एक बार पारदेश्वर महादेव की पूजा से मिलता है। जो पुण्य एक करोड़ बार पाषाण शिवलिंग के रुद्राभिषेक से मिलता है, वह पारदेश्वर के दर्शन मात्र से मिलता है। भगवान शिव का सबसे प्रिय विग्रह स्वरूप पारद शिव है। सावन के अंतिम सोमवार को यहां पारदेश्वर का विशेष अभिषेक, पूजन व अनुष्ठान किया जाता है।

माने जाते हैं स्वयं प्राणप्रतिष्ठित

इन पारदेश्वर शिवलिंग की स्थापना स्वामी प्रज्ञानंद महाराज ने वर्ष 2016 में करवाई थी। मंदिर के पुजारी ने बताया कि पारा धातु सामान्यत: एकत्र नहीं होती है। इसके लिए बाहर से विद्वान बुलाए गए। उनकी उपस्थिति में विशेष जड़ीबूटियों को मिलाकर 1111 किलो पारे के शिवलिंग का निर्माण किया गया। पारे के शिवलिंग को रसलिंग माना जाता है। इसलिए इसकी प्राणप्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं होती। यह स्वयं प्राणयुक्त माने जाते हैं।

पारद संहिता के अनुसार मंदिर का निर्माण

प्रज्ञाधाम आश्रम के संस्थापक स्वामी प्रज्ञानन्द की शिष्या साध्वी विभानन्द ने बताया कि मंदिर का निर्माण पूरे वैदिक व पारद संहिता के नियमों के अनुसार कराया गया है। पारद संहिता के अनुसार पारे का शिवलिंग वहीं स्थापित किया जा सकता है, जहां मंदिर के पश्चिम में विशाल पर्वत हो। दक्षिण में नदी और मंदिर के नीचे चिता की राख होनी चाहिए। चार प्रवेशद्वार होने चाहिए। चारों पर घंटे और नन्दी विराजमान होना चाहिए। पूर्व और दक्षिण में महाकाली विराजमान होना चाहिए। इस मंदिर में यह सभी आदर्श परिस्थितियां मौजूद थीं। चिता की राख की आवश्यकता पूर्ण करने के लिए यह मंदिर संत प्रज्ञानन्द की मां की चिता स्थली के ऊपर बनाया गया है। पारदेश्वर शिवलिंग के दर्शन करने जबलपुर जिले समेत दूर दराज से भक्त आते हैं।

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