क्या जीतू पटवारी के लिए खुलेगा संसद का दरवाजा?:राज्यसभा-लोकसभा चुनाव ठीक सामने, जानिए क्या कहता है MP कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष का ट्रेंड

पूर्व मंत्री और मप्र कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी के लिए अगले तीन महीने उनका भविष्य तय करने वाले हैं। मप्र कांग्रेस के लगभग 40 साल का ट्रेंड देखें तो पीसीसी चीफ का रास्ता दिल्ली या यूं कहें तो संसद के जरिए खुलता आया है। हालांकि जीतू पटवारी ऐसे प्रदेशाध्यक्ष हैं, जो कभी सांसद नहीं रहे। चूंकि सामने ही राज्यसभा और उसके ठीक बाद लोकसभा चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि क्या पटवारी के लिए भी संसद का दरवाजा खुलेगा?

बता दें कि 1985 से अब तक कांग्रेस ने मप्र में जितने भी प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किए हैं, वह अपने राजनीतिक जीवन में सांसद जरूर बने हैं। इसलिए यह चर्चा ज्यादा है। अब देखने वाली बात ये रहेगी कि ट्रेंड को बरकरार रखते हुए कांग्रेस पार्टी जीतू पटवारी को राज्यसभा सांसद बनाती है या फिर लोकसभा का टिकट देकर चुनाव लड़वाती है। ध्यान रहे कि राज्यसभा के लिए कांग्रेस के पास सिर्फ एक ही सीट है।

दरअलस, मप्र में राज्यसभा की खाली हो रही 5 सीटों पर 15 फरवरी से नामांकन, 20 फरवरी तक नाम वापसी और 27 फरवरी को चुनाव के बाद परिणाम घोषित होंगे। इसे देखते हुए बीजेपी और कांग्रेस ने अपने उम्मीदवारों को लेकर तैयारी शुरू कर दी है। इन सीटों में 4 भाजपा और 1 कांग्रेस के खाते में जा सकती है। इस एक सीट के लिए कांग्रेस में भारी खींचतान चल रही है। सूत्रों के अनुसार इस एक सीट के लिए पीसीसी चीफ जीतू पटवारी, पूर्व सीएम कमलनाथ और पूर्व पीसीसी चीफ अरुण यादव भी दावेदारी कर रहे हैं।

बिना सांसद रहते पटवारी बने पीसीसी चीफ
मप्र कांग्रेस के पिछले कुछ दशक का ग्राफ देखें तो 1985 से अब तक जितने भी पीसीसी चीफ बने वह पहले या बाद में सांसद जरूर बने हैं। लेकिन अब जीतू पटवारी का चेहरा सामने है। जो कभी सांसद नही बने हैं और सांसद के दोनों चुनाव उनके सामने है। जीतू पटरवारी चार बार विधानसभा का चुनाव लड़ चुके हैं। जिसमें से वह दो चुनाव जीते और दो चुनाव हारे हैं। पटवारी 2023 का विधानसभा चुनाव भी हार गए हैं। इससे पहले वह प्रदेश युवक कांग्रेस के अध्यक्ष रहे हैं।

35 साल में सांसद जरूर रहे पीसीसी चीफ

मप्र कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष के पद पर 1985 से लेकर अब तक जितने भी नेता काबिज हुए वह अपने राजनीतिक करियर में सांसद जरूर बनें, भले ही वह राज्यसभा से सांसद बने हों या फिर लोकसभा से। 1985 में दिग्विजय सिंह को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था। तब से अब तक पार्टी ने 9 अध्यक्ष नियुक्त किए। इनमें से जीतू पटवारी को छोड़कर सभी अध्यक्ष सांसद रहे या फिर बनाए गए। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं से मिली जानकारी के अनुसार 1985 के पहले भी यानी कि अविभाजित मप्र के समय जो भी पीसीसी चीफ बना वह सांसद जरूर रहा या बनाया गया।

अविभाजित मप्र के ये नेता रहे पीसीसी चीफ और सांसद

– मोतीलाल वोरा अविभाजित मप्र में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष थे। वोरा पीसीसी चीफ के साथ लोकसभा और राज्यसभा के सांसद रह चुके हैं। वह 1988 में राज्यसभा से संसद पहुंचे थे, इसके बाद 1998 और 1999 में लोकसभा का चुनाव लड़कर संसद पहुंचे थे। वोरा को 2002 में कांग्रेस ने फिर से राज्यसभा से संसद भवन पहुंचाया था।

– राम गोपाल तिवारी भी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहे हैं। तिवारी 1971 और 1980 में लोकसभा सांसद बने थे।

– पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह 4 से ज्यादा राज्यसभा और दो बार लोकसभा सांसद रहे।

– मूलतः छत्तीसगढ़ के अरविंद नेताम 6 बार लोकसभा सांसद बने थे। वह अविभाजित मप्र के कांग्रेस पार्टी के प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष थे।

– परसराम भारद्वाज 1980 से 1998 तक लगातार सारंगगढ़ लोकसभा क्षेत्र से सांसद रहे। वह संयुक्त मध्यप्रदेश यानी अविभाजित मप्र के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भी रहे।

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